Discuss the Palaeolithic period Indian civilisation.

प्रश्न 8 पुरापाषाणकालीन भारतीय सभ्यता का वर्णन कीजिए।
Discuss the Palaeolithic period Indian civilisation.
उत्तर–पुरापाषाणकालीन भारतीय सभ्यता—पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर विद्वानों ने तय किया है कि लगभग 5 लाख ई.पू. भारत में मानव का निवास रहा तभी से पाषाण काल शुरू हुआ और यह आज से करीब 40,000 वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। पाषाण काल को तीन भागों—पुरापाषाण, मध्य पाषाण तथा नव पाषाण में बाँटा गया। है। पुरापाषाण काल में भारतीय मानव पत्थर के अनगढ़ और अपरिष्कृत उपकरणों का प्रयोग करता था। उत्तर-पश्चिम भारत के सोहन क्षेत्र में (यह सिन्धु की सहायक नदी । थी) हुई खोजों से पहली बार सांस्कृतिक क्रम-परम्परा का प्रमाण प्राप्त हुआ है। विद्वानों ने इस संस्कृति को सोहन संस्कृति का नाम दिया है। इसकी जानकारी 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में ही हो गयी थी। विद्वानों ने सोहन संस्कृति को दो भागों पूर्व सोहन संस्कृति तथा उत्तर सोहन संस्कृति में बाँटा है। इस स्थान पर हुई खुदाई से बहुत से गंडासे, खंडक, उपकरण, अनेक चक्रिक क्रोड़ तथा बिना चमक के शल्क प्राप्त हुए हैं। गंडासे माँस काटने के काम आते थे। शल्कों को शिकार काटने तथा अन्य कार्यों के लिए प्रयोग में लाया जाता था। इस काल से सम्बन्धित चौंतरा नामक स्थान से (जो सोहन नदी के समीप ही है) हस्त कुठार और शल्क मिले हैं। इस स्थान के कुछ हस्त कुठार बहुत बढ़िया ढंग से तैयार किए लगते हैं और ये पश्चिमी यूरोप के बाद के पाषाण युग के बने उपकरणों से बहुत मिलते हैं। पूर्व सोहन नदी की कुछ काल बाद की संस्कृति को उत्तर सोहन नदी संस्कृति का नाम दिया गया है। इस संस्कृति में (चौंतरों नाम स्थल को छोड़कर) कई विशेषताएं स्पष्ट नजर आती हैं जैसे (i) इसमें गंडासे या खण्डक उपकरण को ही मुख्यतः प्रयोग में लाया गया। (ii) इस संस्कृति में हस्त-कुठार का प्रयोग नहीं हुआ। (iii) सोहन पुरापाषाण संस्कृति से सम्बन्धित उपकरण आरम्भ से अन्त तक एक जैसे ही रहे और उनके प्रारूप में बहुत कम परिवर्तन हुआ। (iv) चौतरा संस्कृति इसमें घुसपैठ-सी प्रतीत होती है और जो मुख्य धारा से पृथक रही और सोहन संस्कृति को बदलने में इसे सफलता नहीं मिली।
सोहन नदी घाटी एवं तट तथा चौतरा नामक स्थानों के साथ-साथ नर्मदा घाटी नरसिंहपुर में पुरापाषाण कालीन भी अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ गंडासे, खण्डक हस्त । कुठार और विदारणियों (सिलपटे या पत्थर का वह उपकरण जिसके सिरे पर धार लगायी जाती है) प्राप्त हुई हैं।
नर्मदा के समीप भीमबेटका की गुफाओं (जिला रायसेन मध्यप्रदेश) में आदि मानव द्वारा बनाए गए सुस्पष्ट निवास-स्थलों की श्रेणी का पता चला है। वे लोग विदारणियों तथा शल्क उपकरणों का प्रयोग जानते थे। ये लोग गंडासा या हस्तकुठार का प्रयोग नहीं करते थे। महाराष्ट्र की प्रवरा नदी (गोदावरी की सहायक नदी) के साथ-साथ नेवासा में, आन्ध्रप्रदेश के करीमपुडी और गिद्दलुर में तथा मद्रास के कई स्थलों पर मिले तत्त्वों से पता लगता है कि वे ाँडासा और खंडक उपकरण प्रयोग में लाते थे। कर्नाटक की दो नदियों—मालप्रभा तथा घाटप्रभा (कृष्णा नदी की सहायक नदियाँ) के आस-पास भी पुरापाषाण कालीन संस्कृति के अवशेष मिलते हैं लेकिन यहाँ के लोग सोहन नदी के लोगों की तरह गंडासों और खंडक का प्रयोग अधिक नहीं करते थे ।
पुरापाषाण युग में भारतीय मानव पाषाण के औजारों का प्रयोग करने के साथ-साथ हड्डियों के उपकरणों का भी प्रयोग करते थे क्योंकि आन्ध्र के कुर्नूल शहर के समीप मिले पत्थर औजारों के साथ-साथ हड़ियों के उपकरण और जानवरों के अवशेष भी मिले हैं। विद्वानों ने इससे निष्कर्ष निकाला है कि पुरापाषाण कालीन भारतीय मानव शिकार एवं भोजन संकलन पर पूर्णतः आश्रित था । पुराणों में कुछ ऐसे लोगों के बारे में जानकारी मिलती है जो कंद-मूल खाकर गुजारा करते थे; ऐसी पुरानी पद्धति से जीविका चलाने वाले कुछ आदिवासी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग आज भी भारत में मौजूद हैं।
पुरा-पाषाण युग की अवस्थाएं भारतीय पुरापाषाण युग को मानव द्वारा प्रयोग में लाए गए पाषाण उपकरणों के अनुसार और जलवायु में हुए परिवर्तनों के आधार पर भी, तीन अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है। ये अवस्थाएं हैं—आरम्भिक अथवा निम्न पुरा-पाषाण युग, मध्य पुरापाषाण युग और उच्च पुरापाषाण युग। अधिकांश हिम युग आरम्भिक या निम्न पुरापाषाण युग में व्यतीत हुआ। हाथ की कुल्हाड़ियों का उपयोग निम्न पुरा-पाषाण युग की विशेषता है। भारत में प्राप्त ऐसी कुल्हाड़ियाँ किसी। हद तक वैसी ही हैं जैसी कि पश्चिमी एशिया, यूरोप और अफ्रीका में प्राप्त कुल्हाड़ियाँ हैं। पाषाण उपकरणों का उपयोग मुख्यतः काटने-छीलने के लिए होता था, इसलिए इन
उपकरणों को कर्तक अथवा गंडासे की संज्ञा दी गई है। आरम्भिक अथवा निम्न | पुरापाषाण युग के स्थल पंजाब की सोहन नदी घाटी में, मध्य भारत में नर्मदा के तटों पर, गोदावरी के नदी मुख क्षेत्र में और तुंगभद्रा तथा पेन्नार के मध्य के क्षेत्र में भी प्राप्त हुए हैं। हाथ की कुल्हाड़ियाँ हिमालय के दूसरे हिमनदज निक्षेप में प्राप्त हुई हैं। इस अवधि में जलवायु कम आई थी।
मध्य पुरापाषाण युग में प्रमुखतः शल्क उपकरणों का उत्पादन हुआ। ये शल्क उपकरण समस्त भारत में पाए गए हैं और इनमें क्षेत्रीय भेद भी देखने को मिले हैं। इनमें प्रमुख उपकरण शल्कों से निर्मित विभिन्न प्रकार की खुरचनियाँ हैं। बरमें भी भारी संख्या में प्राप्त हुए हैं। मध्य पुरापाषाण युग के स्थल सोहन घाटी में प्राप्त हुए हैं। यहाँ हिमालय क्षेत्र के तृतीय हिमाच्छादन के समकालीन स्तर में हम एक अनगढ़ उपल उपकरण उद्योग को देखते हैं। नर्मदा तट के अनेक स्थानों पर तुंगभद्रा में दक्षिण में भी अनेक स्थानों पर इस युग के पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। इस युग में भी जलवायु कम आई थी।
उच्च पुरापाषाण युग में बड़े पैमाने पर नए चकमक उपकरण उद्योगों का और आधुनिक मानव से मिलते-जुलते मानव का जन्म हुआ। भारत में प्राप्त हुए इस युग के विशिष्ट उपकरण हैं-फलक और तक्षणियाँ। पाषाण के ये उपकरण आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, भोपाल एवं छोटा नागपुर के पठार इत्यादि क्षेत्रों में प्राप्त हुए हैं। इसी काल में आधुनिक मानव अथवा होमो-सेपीयन का प्रथम बार आविर्भाव हुआ। इस युग के अन्त में जलवायु अपेक्षाकृत गर्म हो गई थी।
Updated: November 11, 2018 — 4:20 am

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