घरोंदा Gharaonda - A Motivational Life Story ( Hindi)

घरोंदा   Gharaonda - A Motivational Life Story 



बालकनी में खड़ी चाय के प्याले को सिप करते करते जीवन में आये इस अजीब से मोड पर उलझी 
सोच रही थी मेरी नजर छत के  बीचो बीच लटके उस बल्ब की ढीली हुई प्लेट पड़ी 
कुछ इधर -उधर फैले घास के तिनके ,उन्हें सजाते दो चिड़ा चिड़िया का चहचहता जोड़ा | 
छोटे -छोटे तिनको को अपनी चोंच में सुदूर से उठाकर " चिड़ा" लाता और चिड़िया उसे प्यार से सजाती 
एक सुन्दर सा "घोंसला " आकार ले रहा था मेरी बालकनी  | थोड़ी गंदगी अवश्य फ़ैल गयी थी  पर दोनों परिंदो  
प्रसन्नता भरी  चहचाहट  भगाने से रोक दिया | 
 माँ कहा करती थी "चिड़िया की चहचाहट" घर आँगन में आने वाली खुशियों  का संकेत होती है 
शायद इसी यकींन से "ची -ची " का ये गान सुनकर विश्वास होने लगा की जीवन में आया ये परिवर्तन  भी 
मेरे लिए भविष्य  खुशियों का पैगाम हो | 
मन तरंगो पर सपनो की झालर बुनते उस चिड़िया  घोंसले को मुग्धा सी देखने लगी | कोई ६ -८  दिन  की तो बात है  मेरा एम.ए  खत्म ही  हुआ था की  पिताजी की  रोड एक्सीडेंट में  मृत्यु हो गयी | कॉलेज से बड़ी मुश्किल से एक प्लेसमेंट मिला तो माँ ने बिना सोचे विचारे इस महानगर  भेज दिया , घर की जरुरत इतनी अधिक थी की माँ ने अपनी पुरानी सोच से किनारा दूर कर  एक वर्किंग  वीमेन हॉस्टल में अकेले रहने की इजाजत भी दे दी थी | परिवार में आर्थिक जिमेदारी अब मेरी थी माँ, छोटा भाई पिताजी अकाल मृत्यु  सदमे में थे  
 भईया की इंजिनियर की  पढाई रुकना नहीं चाहिए यही सोचकर  दुःख कभी अपने आप पर हावी नहीं होने दिया | एक स्वतंत्र व्यक्तित्व कुछ जिमेदारी एहसास मेरे व्यक्तित्व पर आत्मविश्वास  की परत बन छाने लगे थे | 

परिस्थितयो के  साथ जुझते इस वक्त  में अपने फोकस पर थी की अचानक उस दिन अपने फेसबुक पर  एक नए दोस्त  रिक्वेस्ट  देख कर चौंक उठी 
संजय शर्मा , मेरे ही ऑफिस में मेरे सीनियर बहुत मिलनसार ,मैने सहर्ष स्वीकार कर  ली | 
नहीं जानती थी की सब कुछ इतनी जल्दी होगा "जतिन " बहुत जल्द ही फ्रेंड्स लिस्ट से बाहर निकल " नियरेस्ट डियरेस्ट " बन बैठे | 
सब कुछ  स्वभाविक  तरह से हुआ की में भूल ही गई की मैं  कौन हूँ ? कितनी जिमेदारीया ?
छोटे भाई के दो साल बाकी है तब तक परिवार का एकलौता आर्थिक सहारा ?
 जाने समय का कैसा दौर था ,उम्र का ये पड़ाव ? बचपन से आज तक माँ बाप की हिदायते ,किताबे में सीख देती कहानिया सब भूल गयी ,दोस्ती प्रेम के बहाव में सामाजिक रिश्ते से लुका छिपी खेलते -खेलते इतनी  आगे बढ़ गयी की " लड़की हूँ  " सामाजिक परिवेश में बंधी स्त्री याद नहीं याद नहीं रहा | प्रेम की निद्रा मुझ पर हावी थी 
 नींद से जगाने के लिए माँ का फोन ही काफी था -"हम सब दिल्ली शिप्ट हो रहे है हमारा डी. डी. स्कीम  फ्लैट निकला था उसकी पोजीशन इस महीने मिल  है ,हॉस्टल छोड़ने की तैयारी कर लो "
पापा के जाने के बाद टुकड़ो में बंटे परिवार को एक बन जाने के उत्साह से माँ खुशी 
के समुन्दर में गोते लगाने लगी पर ना जाने सुनते ही मेरे पैर जनवरी दिसम्बर की बर्फ से सुन्न हो गए 
आज तक पैसा भेजकर , फोन पर माँ से रोज बात कर एक निचिन्त जी रही थी में | 
इम्मीनान था की मैं योग्य बेटी हूँ साथ ही मनचाहे प्रेम  पूर्ण महसूस कर रही थी 
क्या माँ ,भाई "जतिन " को स्वीकार कर लेंगे ? क्यों नहीं ? जतिन का स्वभाव ,व्यक्तित्व दोनों किसी को भी 
ओर खिंच लेते है सहज ही , फिर मेरे घरवाले क्यों इंकार करेंगे भला ?
में इस विवाह से पूर्ण आश्वस्त थी , मार्च का अंतिम सप्ताह ,उस  दिन फुर्सत के उन पलो  जतिन के साथ कॉफी सिप करते मैंने उससे पूछ लिया - 
मेरा परिवार दिल्ली शिप्ट होने जा रहा है अपने घरवालों से भी बात करो ना जल्दी ही शादी कर लेंगे ,कितनी आसान हो जाएगी जिंदगी -
जतिन ने कहा " शादी " हमने ये कब तय किया की हम दोनों शादी करेंगे ? "तो इतने दिनों से यह सब क्या  था ?
जो हमारे बीच चल रहा था " मग  पड़ी कॉफी को बीच छोड़ उठा खड़ा हुआ ""दो वयस्कों के बीच कुछ तन मन की जरूरतों के लिए समझौता ,ओर क्या ?" ये क्या कह रहे हो जतिन ? हम समाज में रहते है आंसू हिम्मत का  साथ छोड़ बाहर निकल आये थे | 
देखो में तो समझता था "मॉर्डन पढ़ी लिखी लड़की हो जो शादी ब्याह इन सब के लिए अच्छे खासे करियर को कुर्बान नहीं करती ,जाने क्यों तुम लड़कियां पुरुषो से दोस्ती के सफर को शादी के सलीब पर ही क्यों " मॉर्डन होना या करियर बनाना इस बात का लाइसेंस तो नहीं  की आप जानवर की तरह स्वत्रन्त्र है जैसे मर्जी जीने के लिए ? जिंदगी में मर्यादये सामाजिक दायरे इंसान के लिए ही। .....
मैंने जतिन का पुरजोर विरोध किया पर जतिन भी कहां पीछे हटने वाला था | 
जो कुछ हुआ दोनों की सहमति से - वो मुझे उसी हाल में छोड़ तेजी से निकल गया | 
मैं उसके हाव भाव से अच्छी तरह से समझ गयी थी इंसान पहचानने में मेरी भूल हुई ,इस रिश्ते  भविष्य ढूंढ़ना बेहक़ूफ़ी है | 
मैंने भूल की सो में  सजा की  हकदार हूँ पर मेरे साथ माँ भाई भी। .. ये  क्या कर डाला मैंने ? बिन ब्याह के दो महीने  का गर्भ -- बहुत दिनों से कमजोरी महसूस हो रही थी ,डॉक्टर से मिलने पर वजह पता चला | 
मैंने उसे पसंद किया अपनी सीमाये तोड़ी बचपन से सही माँ -पापा की वो सारी पाबंदिया सहन की क्यों भूल गयी मै सबकुछ ??अपने  जीवन  को नर्क बनाने का शायद मुझे अधिकार हो पर पुरे परिवार को सजा ? कितना कीचड़ उछलेंगे रिश्तेदार ? पिताजी के जाने के बाद  मुश्किलों  संभाला है माँ ने हम सब को | 
क्या बर्दास्त कर पायेगी वो ये सदमा ? उनके दवरा दी गयी आजादी का ये सम्मान किया मैंने ? बिन ब्याही माँ।  में कमजोर , नहीं लड़ पाऊँगी इस समाज से अपने आप से। अपराध बोध ग्रस्त सोच के सारे धागे एक ही बिंदु 
पर आकर मिलने लगे थे | " आत्महत्या " शायद यही मेरे व् अपनों के दुखो अंत होगा , विचार मन में आते ही सारी नकारात्मक ऊर्जा ,सारे नेगेटिव ग्रह  क्रियान्वय करने में सक्रिय  हो गए | 
जितनी बार आत्महत्या के विचार को मन से बाहर निकालने  कोशिश की जाने क्यों जीवन लीला खत्म करने का इरादा और पक्का हो गया |  आसान था कुछ नींद की गोलियां खाकर चेतन लुप्त हो जाना ,सारे विचारो से मुक्त हो जाना ,निष्प्राण हो जाना |  शाम को ऑफिस से माँ के लिए दो महीने की सेलेरी व कुछ फंड क्लीयर कर रात को इस जीवन का अंत...मेरी सोच बिलकुल साफ थी ऑफिस जाते वक्त रोज चिड़िया के बर्तन में पानी भरना व् कुछ चावल के दाने डालना , मेरा नित्य कर्म बन गया था सो पानी भर कर कुछ पल रुक गयी शायद आज के बाद  देख न पाँउ  इस प्रसन्न चिड़ियाँ को ? उसके प्यारे परिवार को ,छोटे छोटे नाचते -फुदकते बच्चो को | पर क्या ? अचानक मेरे देखते ही देखते तीव्र हवा  के झोंके से चिड़ियाँ का घोंसला पलट गया | उसमे बैठे वो नवजात शिशु जमीन पर गिर पड़े | बच्चो के धड़ कही ,गर्दन कही | किसी अनहोनी की आशंका से चिड़ियाँ माँ का दिल दहला होगा , अपने बच्चो को निष्प्राण देख जोर जोर से ची -ची कर शोर मचाने लगी ,कभी बच्चो के धड़ को चोंच से सहलाती तो कभी पास रखे पानी को उन पर ले जाकर ढालती ,उसका अपने चोंच व पंख बच्चो को सहलाना उसकी भाषा मै नहीं समझती मगर उसके दुःख  का अंदाजा मुझे हो रहा था | 
कुछ ही समय में चिड़ा भी आ गया , कोई दो घंटे के विलाप के पश्चात दोनों निढाल अपने बच्चो के शव के  पास
पड़ गए | उन दोनों का विलाप मेरे स्वयं के दुखो को भुला देने के लिए काफी था | 
ऑफिस का हाफ टाइम निकल चूका था ,उनका दुःख कैसे बाँटती ? शाम घर लौटते नींद की गोलियां  की  डब्बी मेरे पास थी मन उदासी के मकड़जाल में फंसा , जीवन अंतिम यात्रा पर जाकर विराम पाना चाहता था ,कुछ करने से पहले मेरे कदम स्वत ही बालकनी की ओर मुड़ गये | 
एक ही पल में मेरी सोच ने पलटा खाया वो दोनों निष्प्राण से पड़े पंछी मेरे लिए माँ -भाई की शक्ल अख्तियार कर चुके थे , क्या मेरे चले जाने के बाद वो दोनों भी ?  क्या आर्थिक सहारा टूटने से ,मेरी आत्महत्या से उठे हजारो सवालों को माँ व छोटा भाई झेल पाएंगे ? मैं तो चाहे दुनिया की रस्मो से आजाद  जाऊ पर क्या इनके जिल्ल्त नहीं छोड़ जाउंगी ? नहीं नहीं ....मुझे मेरे निर्णय पर पुनः विचार करना चाहिए 
थोड़ा ओर वक्त देना चाहिए , शायद " जतिन " माँ बनने की खबर सुन कर लौट आये मेरे पास ?
या फिर इस अनचाहे मेहमान को समाप्त कर में ही लौट जाऊ अपनों के पास | 
किसी अजनबी बेवफा के लिए मरने से  बेहतर है अपनों  के लिए जीना। अपने आप से लड़ती बिस्तर पर जा पड़ी ,आँख कब लग गयी पता ही नहीं चला | सुबह जाकर ही नींद खुली ,कदमो ने बालकनी में जाकर रोका ,ये क्या ? में हैरत में थी सारा दिन का पड़ा दाना पानी सब खत्म हो चूका था ,बच्चो के शवों पर तिनके जमा थे अपने टूटे घोसले से एक - एक तिनका उठाती  पुनः नया घरोंदा बनाने में जुटी  थी , चिड़ा नहीं था साथ में उसके ,पर चिड़िया की कभी न टूटने वाली आस। .. 
इस बात से क्या शिक्षा लूँ में ? समझ नहीं पायी , पर समझ चुकी थी इस जीवन की अपराधी  भी मै हूँ और जज भी स्वयं | नींद की गोलियां को फ्लश कर जीवन का पुनः सामना करने के लिए तैयार हो ऑफिस के लिए निकल पड़ी ,चिड़िया सी मैं |

लेखक - साधना जैन 

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