हिंदी उर्दू ग़ज़ल - Best Romantic Ghazal in Hindi by Salil Saroj





जिनको जीना है,वो उनकी आँखों से जाम पिया करें
और इसी तरह अपने जीने का सामान किया करें

खुदा किसी के मकाँ का शौकीन तो नहीं रहा
तो दिल में ही कभी आरती तो कभी आज़ान किया करें

हमेशा दूसरों की नज़र में ही अहमियत जरूरी है क्या
कभी तो खुद को भी खुद का ही मेहमान किया करें

इश्क़ की बातें बड़ी मख़सूस हुआ करती है,ज़ानिब
जहाँ तक हो आपसे इसे आँखों से बयाँ किया करें

ये ज़मीन की शहजादियाँ बनेंगी हमारी सारी बच्चियाँ
बस रोज़ इनकी हाथों में दो टुकड़ा आसमाँ दिया करें

बड़ी ही हसीन लगेगी ये सर ज़मीन-ए-हिन्दोस्तान
अपनी गलियों में रोज़ होली और रमज़ान किया करें

( सलिल सरोज) 

सलिल सरोज की कविता : आधा प्रेम



















मेरे खेत की मुँडेर पर
वो उदास शाम आज भी 
उसी तरह बेसुध बैठी है
जिसकी साँसें सर्दी की
लिहाफ लपेटे ऐंठी है

मुझे अच्छी तरह याद है
वो शाम
जब तुम
दुल्हन की पूरी पोशाक में
कोई परी बनकर
आई थी

जब सूरज
क्षितिज पर कहीं
ज़मीन की आगोश में
गुम हो रहा था
चाँद अपने बिस्तर से 
निकल कर
सितारों के साथ
अपनी छटाएँ
बिखेर रहा था
ठण्ड की बोझिल हवाएँ
मेरे बदन के रोएँ
खड़ी कर जाती थी
और
इन हालातों में 
सिर्फ और सिर्फ
तुम याद आती थी

तुम्हारे होंठों पर
कहने के लिए
कई उम्र की बातें थी
आँखों में बहने के लिए
पूरा एक समंदर था
और
चेहरे की शिकन में
मजबूरियों का कोई पिटारा
जो बस खुलता
और खत्म कर जाता
हमारे इश्क के सारे
वो अफसाने
जो दुनिया की निगाहों में
खटक रहा था
मैं तुम्हारे काबिल नहीं
और 
तुम मेरे काबिल नहीं
हर कोई 
बस यही
कह रहा था

तुमने भींगे लफ़्ज़ों से
इतना ही कहा
ये हमारी आखिरी मुलाक़ात है
और 
फिर उसके आगे 
मैं कुछ न सुन सका

हर गुजरता लम्हा
मेरे साँस की आखिरी
तारीख़ लग रही थी

आँखें बर्फ सी जम गई थी
तुम्हारी आँखों में
और जिस्म सारा 
इस संसार से ऊब चुका था

मैं बस इतना ही पूछ सका
"आखिर क्यों"
और
वो बस इतना ही बोल सकी
"लड़कियों को मोहब्बत भी
ज़माने से 
पूछ कर करनी पड़ती है
और 
उसकी कीमत ज़िन्दगी भर चुकानी पड़ती है

मैं कल किसी और की हो जाऊँगी
शरीर से जीवित रहूँगी
पर
आत्मा से मर जाऊँगी"

Writer - ( सलिल सरोज )

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Read Best Love Ghazal Written By Salil Saroj बस मुझे ही अपनी गलियों में यूँ ही न बुलाया कर




बस मुझे ही अपनी गलियों में यूँ ही न बुलाया कर 
कभी चाँद बनके तू भी मेरी छत पे आ जाया कर 

मैं जाता ही नहीं किसी भी मंदिर और मस्जिद में 
बस तू ही मुझे मेरे ईश्वर,खुदा सा नज़र आया कर 

मैं क्यों जाऊँ किसी भी काबा या काशी को कभी 
मेरी तासीर पर जन्नत बनकर तू बिखर जाया कर 

मैं हो जाऊँ पाक-साफ़ बस तेरे एक दीदार से ही 
कभी गंगा,कभी जमुना सा मुझमें गुज़र जाया कर 

अगर तेरी सूरत के अलावे भी है कोई जीनत कहीं 
तो भरी दोपहर मुझे भी कभी ये जादू दिखाया कर 

लेखक : सलिल सरोज 

Read Best Hindi Poetry By Salil Saroj :- तुझे चाहिए तो तू मेरा जिस्मों-जान रख



तुझे चाहिए तो तू मेरा जिस्मों-जान रख

पर अपनी तबियत में भी थोड़ा ईमान रख



तेरा घर क्यों बहुत सूना-सूना लगता है 

मेरी मान,घर में कोई बेटी सा भगवान रख


कोई ज़ुल्फ़परस्त की दरिन्दगी नहीं डराएगी

घर के आहते में गीता तो आँगन में कुरआन रख


अपनी ही मेहनत पर यूँ न शक किया कर

लबों पे मिठास और जज़्बों में गुमान रख


ज़िन्दगी हर डगर आसान होती चली जाएगी

हर घड़ी बस अपने लिए नया इम्तहान रख 


( लेखक: सलिल सरोज ) 

ज़िन्दगी - जादू की पुडिया ? Zindgi - Jadu Ki Pudiya






पल पल पल जाने किस पल ,

ख़ुशी हो या फिर ग़म
सबी को बीत जाना है वक़्त के साथ,
जो भी होना है वही होता है,
जो भी सहना है सहना ही है,
जो बीतना हो वही बीतेगा,
ना क़ुछ है किसी के बस में,
जो भी है वो है ' ये पल ' ।


बीते पल तो बीत गए,
कभी वापस ना आने के लिए,

ना लौटने वाले पलों को क्यों सोचे है मन?
जाने ये ज़िन्दगी है किस चिड़िया का नाम?
लागे है कोई जादू की पुडिया,
जो किसी को समज ना आये,
कोई बस मे ना कर पाए।


बीते हुए पल तो बीते हुए पल है,
वापस जुटला नही सकते ,
वक़्त को मोड़ नही सकते ,
जो बीत गयी सो बात गयी,
जीना तो हमे इसी पल मे है,
पल पल बदले है पल ।


लागे है कोई जादू की पुड़िया,
ज़िन्दगी है किस चिड़िया का नाम?


छोठी छोठी ख़ुशियों के इन्तज़ार मे,
तरस कर रेह गयी ये आँखे,
फिर भी मायूस हो कर नही थके,
शायद ज़िन्दगी बर रहे इसी इन्तज़ार मे???


ज़िन्दगी ऐ ज़िन्दगी , जाने क्या है ज़िन्दगी ???
लागे है कोई जादू की पुदिया?

घरोंदा Gharaonda - A Motivational Life Story ( Hindi)

घरोंदा   Gharaonda - A Motivational Life Story 



बालकनी में खड़ी चाय के प्याले को सिप करते करते जीवन में आये इस अजीब से मोड पर उलझी 
सोच रही थी मेरी नजर छत के  बीचो बीच लटके उस बल्ब की ढीली हुई प्लेट पड़ी 
कुछ इधर -उधर फैले घास के तिनके ,उन्हें सजाते दो चिड़ा चिड़िया का चहचहता जोड़ा | 
छोटे -छोटे तिनको को अपनी चोंच में सुदूर से उठाकर " चिड़ा" लाता और चिड़िया उसे प्यार से सजाती 
एक सुन्दर सा "घोंसला " आकार ले रहा था मेरी बालकनी  | थोड़ी गंदगी अवश्य फ़ैल गयी थी  पर दोनों परिंदो  
प्रसन्नता भरी  चहचाहट  भगाने से रोक दिया | 
 माँ कहा करती थी "चिड़िया की चहचाहट" घर आँगन में आने वाली खुशियों  का संकेत होती है 
शायद इसी यकींन से "ची -ची " का ये गान सुनकर विश्वास होने लगा की जीवन में आया ये परिवर्तन  भी 
मेरे लिए भविष्य  खुशियों का पैगाम हो | 
मन तरंगो पर सपनो की झालर बुनते उस चिड़िया  घोंसले को मुग्धा सी देखने लगी | कोई ६ -८  दिन  की तो बात है  मेरा एम.ए  खत्म ही  हुआ था की  पिताजी की  रोड एक्सीडेंट में  मृत्यु हो गयी | कॉलेज से बड़ी मुश्किल से एक प्लेसमेंट मिला तो माँ ने बिना सोचे विचारे इस महानगर  भेज दिया , घर की जरुरत इतनी अधिक थी की माँ ने अपनी पुरानी सोच से किनारा दूर कर  एक वर्किंग  वीमेन हॉस्टल में अकेले रहने की इजाजत भी दे दी थी | परिवार में आर्थिक जिमेदारी अब मेरी थी माँ, छोटा भाई पिताजी अकाल मृत्यु  सदमे में थे  
 भईया की इंजिनियर की  पढाई रुकना नहीं चाहिए यही सोचकर  दुःख कभी अपने आप पर हावी नहीं होने दिया | एक स्वतंत्र व्यक्तित्व कुछ जिमेदारी एहसास मेरे व्यक्तित्व पर आत्मविश्वास  की परत बन छाने लगे थे | 

परिस्थितयो के  साथ जुझते इस वक्त  में अपने फोकस पर थी की अचानक उस दिन अपने फेसबुक पर  एक नए दोस्त  रिक्वेस्ट  देख कर चौंक उठी 
संजय शर्मा , मेरे ही ऑफिस में मेरे सीनियर बहुत मिलनसार ,मैने सहर्ष स्वीकार कर  ली | 
नहीं जानती थी की सब कुछ इतनी जल्दी होगा "जतिन " बहुत जल्द ही फ्रेंड्स लिस्ट से बाहर निकल " नियरेस्ट डियरेस्ट " बन बैठे | 
सब कुछ  स्वभाविक  तरह से हुआ की में भूल ही गई की मैं  कौन हूँ ? कितनी जिमेदारीया ?
छोटे भाई के दो साल बाकी है तब तक परिवार का एकलौता आर्थिक सहारा ?
 जाने समय का कैसा दौर था ,उम्र का ये पड़ाव ? बचपन से आज तक माँ बाप की हिदायते ,किताबे में सीख देती कहानिया सब भूल गयी ,दोस्ती प्रेम के बहाव में सामाजिक रिश्ते से लुका छिपी खेलते -खेलते इतनी  आगे बढ़ गयी की " लड़की हूँ  " सामाजिक परिवेश में बंधी स्त्री याद नहीं याद नहीं रहा | प्रेम की निद्रा मुझ पर हावी थी 
 नींद से जगाने के लिए माँ का फोन ही काफी था -"हम सब दिल्ली शिप्ट हो रहे है हमारा डी. डी. स्कीम  फ्लैट निकला था उसकी पोजीशन इस महीने मिल  है ,हॉस्टल छोड़ने की तैयारी कर लो "
पापा के जाने के बाद टुकड़ो में बंटे परिवार को एक बन जाने के उत्साह से माँ खुशी 
के समुन्दर में गोते लगाने लगी पर ना जाने सुनते ही मेरे पैर जनवरी दिसम्बर की बर्फ से सुन्न हो गए 
आज तक पैसा भेजकर , फोन पर माँ से रोज बात कर एक निचिन्त जी रही थी में | 
इम्मीनान था की मैं योग्य बेटी हूँ साथ ही मनचाहे प्रेम  पूर्ण महसूस कर रही थी 
क्या माँ ,भाई "जतिन " को स्वीकार कर लेंगे ? क्यों नहीं ? जतिन का स्वभाव ,व्यक्तित्व दोनों किसी को भी 
ओर खिंच लेते है सहज ही , फिर मेरे घरवाले क्यों इंकार करेंगे भला ?
में इस विवाह से पूर्ण आश्वस्त थी , मार्च का अंतिम सप्ताह ,उस  दिन फुर्सत के उन पलो  जतिन के साथ कॉफी सिप करते मैंने उससे पूछ लिया - 
मेरा परिवार दिल्ली शिप्ट होने जा रहा है अपने घरवालों से भी बात करो ना जल्दी ही शादी कर लेंगे ,कितनी आसान हो जाएगी जिंदगी -
जतिन ने कहा " शादी " हमने ये कब तय किया की हम दोनों शादी करेंगे ? "तो इतने दिनों से यह सब क्या  था ?
जो हमारे बीच चल रहा था " मग  पड़ी कॉफी को बीच छोड़ उठा खड़ा हुआ ""दो वयस्कों के बीच कुछ तन मन की जरूरतों के लिए समझौता ,ओर क्या ?" ये क्या कह रहे हो जतिन ? हम समाज में रहते है आंसू हिम्मत का  साथ छोड़ बाहर निकल आये थे | 
देखो में तो समझता था "मॉर्डन पढ़ी लिखी लड़की हो जो शादी ब्याह इन सब के लिए अच्छे खासे करियर को कुर्बान नहीं करती ,जाने क्यों तुम लड़कियां पुरुषो से दोस्ती के सफर को शादी के सलीब पर ही क्यों " मॉर्डन होना या करियर बनाना इस बात का लाइसेंस तो नहीं  की आप जानवर की तरह स्वत्रन्त्र है जैसे मर्जी जीने के लिए ? जिंदगी में मर्यादये सामाजिक दायरे इंसान के लिए ही। .....
मैंने जतिन का पुरजोर विरोध किया पर जतिन भी कहां पीछे हटने वाला था | 
जो कुछ हुआ दोनों की सहमति से - वो मुझे उसी हाल में छोड़ तेजी से निकल गया | 
मैं उसके हाव भाव से अच्छी तरह से समझ गयी थी इंसान पहचानने में मेरी भूल हुई ,इस रिश्ते  भविष्य ढूंढ़ना बेहक़ूफ़ी है | 
मैंने भूल की सो में  सजा की  हकदार हूँ पर मेरे साथ माँ भाई भी। .. ये  क्या कर डाला मैंने ? बिन ब्याह के दो महीने  का गर्भ -- बहुत दिनों से कमजोरी महसूस हो रही थी ,डॉक्टर से मिलने पर वजह पता चला | 
मैंने उसे पसंद किया अपनी सीमाये तोड़ी बचपन से सही माँ -पापा की वो सारी पाबंदिया सहन की क्यों भूल गयी मै सबकुछ ??अपने  जीवन  को नर्क बनाने का शायद मुझे अधिकार हो पर पुरे परिवार को सजा ? कितना कीचड़ उछलेंगे रिश्तेदार ? पिताजी के जाने के बाद  मुश्किलों  संभाला है माँ ने हम सब को | 
क्या बर्दास्त कर पायेगी वो ये सदमा ? उनके दवरा दी गयी आजादी का ये सम्मान किया मैंने ? बिन ब्याही माँ।  में कमजोर , नहीं लड़ पाऊँगी इस समाज से अपने आप से। अपराध बोध ग्रस्त सोच के सारे धागे एक ही बिंदु 
पर आकर मिलने लगे थे | " आत्महत्या " शायद यही मेरे व् अपनों के दुखो अंत होगा , विचार मन में आते ही सारी नकारात्मक ऊर्जा ,सारे नेगेटिव ग्रह  क्रियान्वय करने में सक्रिय  हो गए | 
जितनी बार आत्महत्या के विचार को मन से बाहर निकालने  कोशिश की जाने क्यों जीवन लीला खत्म करने का इरादा और पक्का हो गया |  आसान था कुछ नींद की गोलियां खाकर चेतन लुप्त हो जाना ,सारे विचारो से मुक्त हो जाना ,निष्प्राण हो जाना |  शाम को ऑफिस से माँ के लिए दो महीने की सेलेरी व कुछ फंड क्लीयर कर रात को इस जीवन का अंत...मेरी सोच बिलकुल साफ थी ऑफिस जाते वक्त रोज चिड़िया के बर्तन में पानी भरना व् कुछ चावल के दाने डालना , मेरा नित्य कर्म बन गया था सो पानी भर कर कुछ पल रुक गयी शायद आज के बाद  देख न पाँउ  इस प्रसन्न चिड़ियाँ को ? उसके प्यारे परिवार को ,छोटे छोटे नाचते -फुदकते बच्चो को | पर क्या ? अचानक मेरे देखते ही देखते तीव्र हवा  के झोंके से चिड़ियाँ का घोंसला पलट गया | उसमे बैठे वो नवजात शिशु जमीन पर गिर पड़े | बच्चो के धड़ कही ,गर्दन कही | किसी अनहोनी की आशंका से चिड़ियाँ माँ का दिल दहला होगा , अपने बच्चो को निष्प्राण देख जोर जोर से ची -ची कर शोर मचाने लगी ,कभी बच्चो के धड़ को चोंच से सहलाती तो कभी पास रखे पानी को उन पर ले जाकर ढालती ,उसका अपने चोंच व पंख बच्चो को सहलाना उसकी भाषा मै नहीं समझती मगर उसके दुःख  का अंदाजा मुझे हो रहा था | 
कुछ ही समय में चिड़ा भी आ गया , कोई दो घंटे के विलाप के पश्चात दोनों निढाल अपने बच्चो के शव के  पास
पड़ गए | उन दोनों का विलाप मेरे स्वयं के दुखो को भुला देने के लिए काफी था | 
ऑफिस का हाफ टाइम निकल चूका था ,उनका दुःख कैसे बाँटती ? शाम घर लौटते नींद की गोलियां  की  डब्बी मेरे पास थी मन उदासी के मकड़जाल में फंसा , जीवन अंतिम यात्रा पर जाकर विराम पाना चाहता था ,कुछ करने से पहले मेरे कदम स्वत ही बालकनी की ओर मुड़ गये | 
एक ही पल में मेरी सोच ने पलटा खाया वो दोनों निष्प्राण से पड़े पंछी मेरे लिए माँ -भाई की शक्ल अख्तियार कर चुके थे , क्या मेरे चले जाने के बाद वो दोनों भी ?  क्या आर्थिक सहारा टूटने से ,मेरी आत्महत्या से उठे हजारो सवालों को माँ व छोटा भाई झेल पाएंगे ? मैं तो चाहे दुनिया की रस्मो से आजाद  जाऊ पर क्या इनके जिल्ल्त नहीं छोड़ जाउंगी ? नहीं नहीं ....मुझे मेरे निर्णय पर पुनः विचार करना चाहिए 
थोड़ा ओर वक्त देना चाहिए , शायद " जतिन " माँ बनने की खबर सुन कर लौट आये मेरे पास ?
या फिर इस अनचाहे मेहमान को समाप्त कर में ही लौट जाऊ अपनों के पास | 
किसी अजनबी बेवफा के लिए मरने से  बेहतर है अपनों  के लिए जीना। अपने आप से लड़ती बिस्तर पर जा पड़ी ,आँख कब लग गयी पता ही नहीं चला | सुबह जाकर ही नींद खुली ,कदमो ने बालकनी में जाकर रोका ,ये क्या ? में हैरत में थी सारा दिन का पड़ा दाना पानी सब खत्म हो चूका था ,बच्चो के शवों पर तिनके जमा थे अपने टूटे घोसले से एक - एक तिनका उठाती  पुनः नया घरोंदा बनाने में जुटी  थी , चिड़ा नहीं था साथ में उसके ,पर चिड़िया की कभी न टूटने वाली आस। .. 
इस बात से क्या शिक्षा लूँ में ? समझ नहीं पायी , पर समझ चुकी थी इस जीवन की अपराधी  भी मै हूँ और जज भी स्वयं | नींद की गोलियां को फ्लश कर जीवन का पुनः सामना करने के लिए तैयार हो ऑफिस के लिए निकल पड़ी ,चिड़िया सी मैं |

लेखक - साधना जैन 

हिन्दी कविता : किस्मत का खेल है




Kismath ka khela hai,
Sab Kismath ka khela hai?
Dhoond rahe hai dhoond rahe hai,
Khud ko dhoond rahe hai,
Na paavoon kahi dhoond rahe hai,
Kuch tho karna hai,
Hum kisi se kum nahi,
Jeena hai muje , muskurana hai muje,
Hasna hai rona hai,
Haste haste rona hai, jeena hai muje,
Jaane kyo hai yeh zindagi ?
Naa jiya ja raha hai!

Kya huva kyon hua, jiya jaaye na,
Bhool bhulaiya hai haan bhool bhulaiya hai,
Dhoond rahe hai dhoond rahe hai,
Jeena dushvaar hai,

Jeena chaahte hai, udna chaahte hai,
Kismat hai kaisi kismath hai paayi?
Jaana hai jeena hai sapney poorey Karne hai,
Jeene ka matlab Samaj na aaye,
Jeene ka bahana dhoond rahe?

Kismath ka khela hai,
Sab Kismath ka khela hai?

26 अगस्त 2018 रक्षाबंधन- बहने पूजा की थाली में रखें ये 7 चीजे तभी पूरा होगा रक्षाबंधन

राखी के त्यौहार पर अन्य त्योहारों की तरह ज्यादा रस्में तो नही की जाती लेकिन कुछ वैदिक तरीके अपनाएं जाएँ, इस बात का ध्यान अवश्य देना चाहिए कि राखी बांधते समय पूजा की थाली से संबंधित कुछ नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए।

रक्षाबंधन के दिन बहन द्वारा पूजा की थाली में कौन कौन सी वस्तुएं होनी चाहिए और ये वस्तुएं क्यों जरुरी हैं...


कुमकुम- 

यानि रोली, हिन्दू धर्म में मान्यता है कि किसी भी काम की शुरुआत कुमकुम या रोली का तिलक लगाकर करनी चाहिए, ऐसा करने से वो कार्य सफल होता है, तिलक मान-सम्मान का प्रतीक है, बहन तिलक लगाकर भाई के प्रति सम्मान प्रकट करती है, भाई के माथे पर तिलक लगाते हुए बहन भाई की लंबी उम्र की कामना भी करती है इसलिए पूजा की थाली में कुमकुम रखना न भूलें।

चावल (अक्षत)-  

आप जानते होंगे कि तिलक लगाते समय चावल लगाना भी अनिवार्य होता है, चावल को अक्षत कहा जाता है अक्षत यानि जो अधूरा न हो, इसलिए तिलक के ऊपर चावल लगाने का भाव है, भाई के जीवन पर तिलक का शुभ असर हमेशा बना रहे, ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चावल शुक्र ग्रह से सबंधित है, शुक्र ग्रह के प्रभाव से ही जीवन में भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है इसलिए पूजा की थाली में चावल अवश्य रखें।

नारियल-  

यह एक ऐसी वस्तु है जो आजकल सभी बहनें थाली में रखना भूल जाती हैं, दरअसल वैदिक परम्परा के अनुसार कुमकुम चावल का तिलक करने के बाद बहन भाई को नारियल देती है, नारियल को श्री फल भी कहा जाता है जो देवी लक्ष्मी का फल है, यह फल देते हुए बहन ये कामना करती है कि उसके भाई के जीवन में सुख और समृद्धि हमेशा बनी रहे और भाई लगातार उन्नति करता रहे।

रक्षासूत्र-  

अब बारी आती है राखी बांधने की, कहा जाता है कि रक्षासूत्र बांधने से त्रिदोष शांत होते हैं, हमारे शरीर में कोई भी बीमारी ये त्रिदोषों से ही ही संबंधित होती है, रक्षासूत्र कलाई में बांधने से त्रिदोषों का संतुलन बना रहता है, इसका वैज्ञानिक रूप से भी एक कारण है कि रक्षासूत्र कलाई पर बाँधने से नशों पर दबाव बना रहता है जिससे त्रिदोष नियंत्रित रहते हैं

मिठाई-  

ये रस्म आज के दौर में सभी बहनें निभाती हैं, राखी बांधने के बाद बहनें अपने भाई को कुछ मीठा खिलाती हैं लेकिन यह मिठाई क्यों खिलाई जाती है इसके पीछे भी एक मान्यता है जिसके अनुसार जब बहनें राखी बांधने के बाद अपने भाई को मिठाई खिलाकर उसका मुंह मीठा कराती हैं तो इससे दोनों के रिश्ते में मिठास भरती है, मिठाई खिलाते समय बहन यह कामना करती हैं कि दोनों के रिश्ते में कभी कड़वाहट न आये।

पानी से भरा कलश- 

पानी से भरा कलश थाली में होना बहुत आवश्यक है, यह कलश पारंपरिक रिवाज के अनुसार तांबे का ही होना चाहिए और इसी कलश के जल को रोली में मिलाकर तिलक लगाया जाता है, हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार इसी कलश में सभी पवित्र तीर्थों और देवी देवताओं का वास होता है, इस कलश के प्रभाव से भाई बहन के बीच सुख और स्नेह हमेशा बना रहता है।

जीवन- दर्शन की अभिलाषा Jivan Darshan Ki Abhilasha





जीवन- दर्शन की अभिलाषा 

अँधियारी जाने को है,
नया सवेरा आने को है
जीवन के कठिन मोड़ पे,
नए चेतना उन्मुक्त होने को है |
जीवन को उत्कृष्ट करें,
तन-मन को निर्मल करें
ह्रदय को पवित्र करें
नया वातावरण बनने को है |
अपनी कुशल क्षमताएँ पहचानें,
सारी सुख-सुविधाएँ आने को है |
को कविता आप आने को है,
चेहरे पर मुस्कान लेकर
जीवन के कठिन मोड़ पे,
नए मुकाम हासिल होने को है |
सागर की लहरो जैसा,
जीवन में आनंद आने को है
सूरज की रौशनी सा,
दुनिया में नया सवेरा होने को है
नए मुकाम हासिल होने को है |   

-------AKHILESH KUMAR BHARTI (Akhilesh.bharti59@gmail.com)---------------------

जीवन सत्यता की परिभाषा Definition of life truth Hindi


जीवन सत्यता की परिभाषा


जीवन क्या है- यह प्रश्न् सदैव जिज्ञासुओं को उद्वेलित करते आया है- जीवन उतार-चढ़ाव का प्रयाय है, यह सांसारिक जीवन दर्शन का बोधक है। आज सुख है कल दुःख भी है, किसी न किसी रूपेण इस इकाई से हम मुह मोड़ नही सकते। हर स्थितियों और परिस्थितियों में हमें एक जैसा रहना कठिन सा है पर असम्भव नही। संघर्ष हमारे जीवन का सबसे बड़ा आशिर्वाद है। जीवन को उत्कृष्ट करने के लिए तन -मन से मेहनत कर नया वातावरण बनाना पड्ता है । नए चेतना उन्मुक्त होने के लिए अपनी कुशल योग्यता पहचानने पड़ते है, जीवन में अगर संघर्ष है, कठिनाई है तो समझो जीवन सही रास्ते पे चल रही है। जीवन विचारों का खेल है, सभी प्राणी को इस खेल को खेलना पड़ता है, कोई तेज खेलता है, कोई धीमी, परंतु यह खेल मनुष्य को हर पल खेलना पड़ता है। मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और दुश्मन भी उसके विचार ही होते है, जिसे हम सकारात्मक और नकारात्मक भी कह सकते है । जिन्हें यह खेल में महारत हासिल हो जाता है, उन्हें हम कहते है की उन्हें आध्यात्मिक और प्रबतलता का बोध हो चूका है, यही जीवन का सारतत्व है। गतिशीलता ही सफलता की राह आसान करती है, अपितु निरंतर प्रयास सही दिशा देती है, इंसान बनकर इंसानियत की भाषा केवल श्रेष्ठ मनुष्य ही दे सकता है।
हर मानव अपने जीवन में सफल होना चाहता है, पर सफलता को प्राप्त करने के लिए हमें सर्वप्रथम सफल जीवन की परिभाषा को जानना होगा। सफलता-असफलता दो कड़ी है, बीच में "अ" अक्षर का आतंरिक भेद है। इसे बरकरार रखना कठिन होता है। समय की परछाई के साथ हम अपनी गाडी को नही भगा पाते,  अतएव इन सब स्थितियों से गुजरना पड़ता है, परंतु अपने को हमेशा मुस्कान, ख़ुशी के लिए कुछ करना है, बनना है ऐसा प्रयाय नही होना चाहिए । कुछ करना सोचोगे तो खुद -बखुद इतना मिल जायेगा की बनना सोचने से ज्यादा ही आशान्वित लगेगा । मनुष्य के पास चाहे जितना भी धन हो, सोना-चांदी हो या घर-परिवार हो अगर जीवन में खुशी ना हो तो जिंदगी बेकार है। खुशियाँ एक चुम्बकीय गुण है,  बाँटो तो और सुख मिलता है। सभी लोग जीवन को अपने-अपने नजरिये से देखते है । सफलता उन्हें मिलती है, जो सपने देखना पसंद करते है, जिनके सपनो मे जान होती है।

 बड़ा आदमी बनना आसान हो सकता है, अपितु बड़प्पन एवम अपनत्व अपने अंदर लाना उतना ही कठिन है | अच्छे बनने की होड़ में अपने अच्छाई को कतई पीछे न छोड़ना, नही तो बुराई आगे आकर आपकी अच्छाई को नष्ट कर देगी, जो आपके जीवन मूल्यो को ख़त्म कर देती है | सदैव सकारात्मक पहलू विद्धवता का परिचायक है|  नकारात्मक सीढ़ियों के सहारे हम सकारात्मक विचारो की नींव बना सकते है। जिस किसी मानव ने प्रमाणिकता की कसौटी से खरे उतरे है, वही अपनी अंतर -चेतना की अनुभूति में स्वयं को महसूस कर सकते है । दुनिया में जीने का एक मुकाम होता है, हर किसी के जिंदगी का इस दुनिया में हिसाब होता है, जीना जानते है सही से कुछ लोग, पर जिंदगी जीने का अंदाज कुछ को ही होता है |  तकदीर लिखती नहीं बनाई जाती है | मन से इंसान को नही हारना चाहिए, क्योंकि मन से हारा हुआ इंसान कभी जीत नही पाता। हारा हुआ इंसान कमजोर नही होता, अपितु मन से हारा हुआ इंसान कमजोर होता है । समय की उपियोगिता सफलता की राह दिखाती है,  और सौम्यता, विनम्रता चारित्रिक दर्पण होता है । महानता गिरने से कम नही होती अपितु गिर कर उठने से महानता प्रबल होता है।
नास्तिक और आस्तिक जीवन विलोम हमने खुद ही बनाया है, और हम समय -समय स्वयं ही इसे परिभाषित करते है, क्या इसे परिभाषित करने से जीवन उत्कृष्ट हो जायेगा, शायद नही, जीवन पुण्य निर्मल पवित्र आत्मा को रखने से मिलती है । गतिशीलता ही सफलता की राह आसान करती ।जीवन को तूफ़ान के गुजरने का इंतज़ार नही करना चाहिए, अपितु बरसात में भींग कर जीवन का अमृतमय आंनद लेना चाहिए। काम छोटा हो या बड़ा जीवन कभी समाप्त नही होता, राह बदलते रहते है, काम कभी ख़त्म नही होता अपितु समय के साथ निरंतर नयी परिभाषित होते जाती है। जिस नज़र से आप इस दुनिया को देखोगे, वैसा ही आपको सबकुछ लगेगा। अनाथ, असहाय की मदद करने से जितनी पुण्य मिलती है, उतना ही पुण्य निर्मल पवित्र आत्मा को रखने से मिलती है ।

हौसलों से विजय गाथा परिभाषित होता है, हर सफल इंसान एक -सा नहीं होता,  और उन्हें बुलंदियों पर पहुँचाने वाले भी एक -सा नही होते| अकेले मंजिल पाना कठिन-सा, पर असंभव- सा नहीं, कांटो पर चल कर मुस्कुराना भी एक जिंदगी है| जीवन सुख-दुःख का पहिया है, कभी किसी वक्त हताश न होना| जीवन में आए मुश्किलों से अपने को परेशान न करना, जीवन उतार-चढ़ाव का पर्याय है, कभी अपने आत्मबल को कमजोर न होने देना| अँधियारी जाएगी, नया सवेरा आएगा, जीवन के कठिन मोड़ पे,  नए चेतना उन्मुक्त होंगे ।
ह्रदय को पवित्र करें नया वातावरण बनने को है| अपनी कुशल क्षमताएँ पहचानें, सारी सुख-सुविधाएँ आने को है, अपने स्वाभिमान से अपने आत्मविश्वास में नया जोश भरे यही जीवन का सही परिभाषा है,  जिसे हर मनुष्य को अपने ह्रदय के धरातल पे उतारना चाहिए।



अखिलेश कुमार भारती(AKHILESH KUMAR BHARTI)
सहायक प्रबंधक (डी. सी. सी .-ईस्ट जोन -जबलपुर )
मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी लिमिटेड , जबलपुर
संपर्क नंबर - ०९८२६७६७०९६
ईमेल -अखिलेश.भारती५९@जीमेल.कॉम

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